After so long “चाय की प्याली और तुम”
सुबह की पहली किरण के संग,
जब बच्चों की रौनक घर से निकलती है,
मैं बस एक प्याली चाय लेकर
थोड़ी देर को ठहर जाती हूँ —
और वहीं तुम याद आ जाते हो।
कभी हँसी बनकर याद आते हो,
कभी किसी अधूरी बात की तरह,
कभी बस यूँ ही —
जैसे किसी कोने में रखा हुआ
पुराना गीत फिर से बज उठा हो।
दिन भर दफ़्तर की भागदौड़ में
समय तो कट जाता है,
पर जब शाम को केतली से उठती भाप
टेबल पर उतरती है,
तो दिनभर की सब अनकही बातें
फिर वही चाय के साथ लौट आती हैं —
और तुम्हारा ख़याल भी।
तुम्हारे रहते वक़्त उलझा भी रहता था,
और सुलझा भी —
पर बीतता कैसे था,
ये कभी समझ नहीं आया।
अब जब आवाज़ देती हूँ
तो सन्नाटा जवाब देता है,
मोबाइल की स्क्रीन पर नाम तो दिख जाता है,
पर वो एहसास नहीं आता —
जो सामने बैठकर,
एक प्याली चाय बाँटने में आता था।
अब चाय वही है,
कप वही है,
बस मेज़ के उस पार तुम नहीं।
फिर भी हर चुस्की में
तुम्हारा स्वाद बाकी है…
हर साँस में,
एक अधूरापन बाकी है।
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