Monday, October 27, 2025

“छठ की वो संध्या और नानी माँ का आँगन” 🌅


दीए की लौ में नानी माँ का चेहरा दमकता था,

और जल में डूबे उनके हाथ जैसे दुआओं से भीगे थे।

मेरे लिए उन्होंने माँगा था सबकुछ —

सुख, सेहत और जीवन का उजियारा,

पर शायद यह नहीं माँगा था,

कि हम उसी घाट पर हर बरस लौट आएँ दोबारा।


अब भी जब छठ का सूरज ढलता है,

मन अपने आप उस आँगन में चला जाता है,

जहाँ धूप से सने आटे की महक,

और चूल्हे पर सिकते ठेकुआ की सुगंध

पूरे घर को अपने में समेट लेती थी।


घर क्या, पूरा मोहल्ला उनकी छाँव में था,

हर कोई उनके स्नेह का हिस्सा बन जाता था,

उनके आँचल में जैसे पूरा संसार समा जाता था,

और गीतों में गूँजती थी एक माँ जैसी ममता।


आज भी वही गीत बजते हैं,

वही घाट सजे हैं, वही जल में दीप तैरते हैं,

पर दिल में अब सन्नाटा उतर आता है,

जैसे नानी माँ के बिना छठ अधूरा रह जाता है।


हर बार जब सूर्य अर्घ्य को छूता है,

आँखें भीग जाती हैं, मन ठहर जाता है,

लगता है — कहीं दूर उस उजाले में,

नानी माँ अब भी मुस्कुरा रही हैं,

और अपनी हथेलियों से हमें आशीष दे रही हैं।

Thursday, October 23, 2025

चाय की प्याली और तुम

After so long  “चाय की प्याली और तुम”

सुबह की पहली किरण के संग,
जब बच्चों की रौनक घर से निकलती है,
मैं बस एक प्याली चाय लेकर
थोड़ी देर को ठहर जाती हूँ —
और वहीं तुम याद आ जाते हो।

कभी हँसी बनकर याद आते हो,
कभी किसी अधूरी बात की तरह,
कभी बस यूँ ही —
जैसे किसी कोने में रखा हुआ
पुराना गीत फिर से बज उठा हो।

दिन भर दफ़्तर की भागदौड़ में
समय तो कट जाता है,
पर जब शाम को केतली से उठती भाप
टेबल पर उतरती है,
तो दिनभर की सब अनकही बातें
फिर वही चाय के साथ लौट आती हैं —
और तुम्हारा ख़याल भी।

तुम्हारे रहते वक़्त उलझा भी रहता था,
और सुलझा भी —
पर बीतता कैसे था,
ये कभी समझ नहीं आया।

अब जब आवाज़ देती हूँ
तो सन्नाटा जवाब देता है,
मोबाइल की स्क्रीन पर नाम तो दिख जाता है,
पर वो एहसास नहीं आता —
जो सामने बैठकर,
एक प्याली चाय बाँटने में आता था।

अब चाय वही है,
कप वही है,
बस मेज़ के उस पार तुम नहीं।
फिर भी हर चुस्की में
तुम्हारा स्वाद बाकी है…
हर साँस में,
एक अधूरापन बाकी है।