Monday, October 27, 2025

“छठ की वो संध्या और नानी माँ का आँगन” 🌅


दीए की लौ में नानी माँ का चेहरा दमकता था,

और जल में डूबे उनके हाथ जैसे दुआओं से भीगे थे।

मेरे लिए उन्होंने माँगा था सबकुछ —

सुख, सेहत और जीवन का उजियारा,

पर शायद यह नहीं माँगा था,

कि हम उसी घाट पर हर बरस लौट आएँ दोबारा।


अब भी जब छठ का सूरज ढलता है,

मन अपने आप उस आँगन में चला जाता है,

जहाँ धूप से सने आटे की महक,

और चूल्हे पर सिकते ठेकुआ की सुगंध

पूरे घर को अपने में समेट लेती थी।


घर क्या, पूरा मोहल्ला उनकी छाँव में था,

हर कोई उनके स्नेह का हिस्सा बन जाता था,

उनके आँचल में जैसे पूरा संसार समा जाता था,

और गीतों में गूँजती थी एक माँ जैसी ममता।


आज भी वही गीत बजते हैं,

वही घाट सजे हैं, वही जल में दीप तैरते हैं,

पर दिल में अब सन्नाटा उतर आता है,

जैसे नानी माँ के बिना छठ अधूरा रह जाता है।


हर बार जब सूर्य अर्घ्य को छूता है,

आँखें भीग जाती हैं, मन ठहर जाता है,

लगता है — कहीं दूर उस उजाले में,

नानी माँ अब भी मुस्कुरा रही हैं,

और अपनी हथेलियों से हमें आशीष दे रही हैं।

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